शनिवार, 6 जून 2020

वानरराज बाली (Vaanar Raaj Baali)


|| जय सिया राम || 



| |  वानरराज बाली  | | 


 
 
वानरराज बाली और सुग्रीव दोनों ही भाई थे | बाली किष्किंधा का राजा था तथा इंद्र का पुत्र था | भगवान विष्णु के अवतार श्री राम ने उसका वध करके उसका उद्धार किया तथा वानरलोक में सुग्रीव को राजा बनाकर धर्म की स्थापना में अपना योगदान दिया |  बाली की पत्नी का नाम तारा था तथा उसके पुत्र का नाम अंगद था | बाली को  अपने पिता इंद्रदेव से एक दिव्य स्वर्णहार प्राप्त हुआ था जो ब्रह्मा जी ने अभिमंत्रित  करके इंद्रदेव को दिया था | उस स्वर्ण हार को पहनकर बाली जब भी किसी शत्रु के सामने जाता था तो उसके शत्रु की शक्ति क्षीण हो जाती थी तथा आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी | बाली भी रावण की तरह ही परम पराक्रमी और बलशाली होने के साथ-साथ अभिमान या दुराचारी था | एक बार उसने तो दुंदुभि नामक राक्षस का वध करके उसके शव को हवा में उछाल कर दूर फेंका | राक्षस शव के रक्त की कुछ बूंदें महर्षि मतंग के आश्रम में गिरी जो ऋषिमुख पर्वत में स्थित था | क्रोधित हो मतंग ऋषि ने बाली को शाप दिया कि उनके आश्रम के एक योजन के दायरे में अगर बाली आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा|  एक बार छली कपटी रावण ने देव मुनि नारद के भड़काने पर बाली पर पीछे से वार किया, किंतु बाली ने रावण को अपनी पूंछ में लपेटकर उसे बगल में दबा दिया तथा विश्व भर में घुमाता रहा ताकि सबको दिखा सकी रावण से डरने की जरूरत नहीं है  केवल बाली ही सर्वशक्तिशाली है | रावण ने अपनी हार मानकर बाली से क्षमा मांगी तथा मित्रता का हाथ बढ़ाया और बाली ने स्वीकार कर लिया | इस तरह दोनों दुराचारी और अभिमानी  एक हो गए |

King Janaka's guru was Ashtavakra. King Janaka was a spiritual and knowledgeable of the great Vedas. The conversation between King Janaka and Guru Ashtavakra is called the Ashtavakra Gita. Only after this great conversation, King Janak got answers to the questions of his inquisitive mind and attained enlightenment. Mithila was very lucky to have a ruler like King Janak. King Janaka loved Rama like Sita ji. Bali, like Ravana, was arrogant or vicious as well as being extremely powerful and powerful. Once he slaughtered a demon named Dundubhi and threw his body away in the air. A few drops of blood of the demon corpse fell in the ashram of Maharishi Matang, which was located in Rishimukh mountain. Enraged, Matang Rishi cursed Bali that if Bali comes within the scope of a plan of his ashram, he will die. Once the fraudulent Ravana attacked Bali on the instigation of Dev Muni Narada, but Bali wrapped Ravana in his tail and pressed him in the side and rotated around the world to show everyone that there is no need to fear Ravana. Only Bali is omnipotent. Ravana, accepting his defeat, apologized to Bali and extended a hand of friendship and Bali accepted. In this way both the vicious and arrogant became one.
 
 
दुंदुभि के वध के बाद के कुछ समय बाद उसके भाई मायावी ने बाली को ललकारा | दोनों में घनघोर युद्ध हुआ तथा मायावी  खुद को  पराजित होता देख भाग खड़ा हुआ , बाली उसे कहां छोड़ने वाला था | बाली भी दौड़ पड़ा  उसके पीछे पीछे और सुग्रीव बाली के पीछे पीछे भागे |  मायावी राक्षस डरकर एक गुफा में घुस गया तथा बाली ने अपने छोटे भाई सुग्रीव को आदेश दिया कि जब तक मैं बाहर ना आ जाऊं , तुम इस गुफ़ा के द्वार की रखवाली करना|  बाली गुफा में राक्षस को मारने चला गया और सुग्रीव अपने बड़े भाई की आज्ञा का पालन करते हुए भाग खड़े रहा | खड़े खड़े सुग्रीव पूरे एक साल तक गुफा के द्वार पर खड़ा इंतजार करता रहा 1फिर एक दिन के गुफा में उसे चीख सुनायी दी तथा रक्त की धारा अंदर से बाहर तक आई , सुग्रीव को लगा की उस मायावी राक्षस ने छल से बाली  भैया को मार दिया है| अब अगर मायावी राक्षस बाहर आ गया तो वह भी मारा जाएगा यह सोचकर सुग्रीव ने गुफा का मुंह पत्थर से बंद कर दिया|  वापस आकर जब उसने सभी परिवार जनों को यह बात बताई तो सबने उसे किष्किंधा का राजा बन जाने को कहा| राज्याभिषेक के समय ही बाली वापस आ गया और सुग्रीव का राजतिलक होता देख क्रोध में उसे पीटने लगा|  सुग्रीव ने बहुत समझाया पर बाली कहां मानने वाला था | बाली ने सुग्रीव को मारने की कोशिश की तो सुग्रीव वहां से भागकर ऋषिमुख पर्वत पर जाकर रहने लगा | मतंग मुनि के शाप के कारण वहां नहीं जा सकता था लेकिन दुराचारी बाली ने सुग्रीव की पत्नी रुमा को जबरदस्ती अपनी पत्नी बना लिया | रावण के समान बाली भी पराई स्त्रियों का हरण कर लेता था उसका वध भी बहुत ही जरूरी था | सुग्रीव ऋषि मुख पर्वत पर अपने कुछ मंत्रियों, हनुमान जी तथा जामवंत आदी के साथ रहने लगे | 
 
 Shortly after Dundubhi's slaughter, her brother Mayavi challenged Bali. A fierce battle ensued between the two and the elusive, seeing himself defeated, ran away, where was Bali to leave him. Bali also ran after him and Sugriva ran behind Bali. Fearing the elusive demon, he entered a cave and Bali ordered his younger brother Sugriva to guard the gate of this cave until I come out. Bali went to kill the demon in the cave and Sugriva kept running away, following the orders of his elder brother. Sugriva stood and waited at the entrance of the cave for a whole year. Then one day he heard a scream in the cave and a stream of blood came from inside to outside, Sugriva felt that the elusive monster killed Bali Bhaiya with deceit. Is Now if the elusive monster comes out, thinking that he will be killed, Sugriva closed the mouth of the cave with stone. When he came back and told this to all the family members, everyone asked him to become the king of Kishkindha. At the time of the coronation, Bali returned and after seeing Sugriva's coronation, he started beating him in anger. Sugriva explained a lot but where was Bali supposed to be? When Bali tried to kill Sugriva, Sugriva ran away from there and started living on Mount Rishimukh. Due to the curse of Matang Muni, he could not go there, but the vicious Bali forced Sugriva's wife Ruma to be his wife. Like Ravan, Bali also killed foreign women, her slaughter was also very important. Sugriva lived with some of his ministers, Hanuman ji and Jamwant Aadi, on the Rishi Mukh mountain.
 
एक बहुत ही रोचक प्रसंग बाली और भक्त शिरोमणि हनुमान जी के मध्य घटित हुआ उस का संक्षिप्त वर्णन  है :-
 
 A very interesting incident happened between Bali and devotee Shiromani Hanuman ji is a brief description of that: -
एक बार मदमस्त हाथी की भांति अपनी शक्ति के मद में चूर बाली वनों में घूम रहा था तब उसने हनुमान जी को देखा जो राम का नाम जाप करने में लगे हुए थे | घमंडी बाली ने हनुमान जी से कहा किस का जप करते रहते हो ,मैं ही सबसे शक्तिशाली हुँ किसी दिन बुला लाओ अपने प्रभु राम को उन्हें भी देखूं लूंगा बस इतना सुनते ही हनुमान जी ने कहा कि पहले प्रभु के भक्त को हरा कर दिखाओ तब उनको ललकारना | तय हुआ की दोनों में युद्ध होगा तो  युद्ध के ठीक पहले ब्रह्मा जी हनुमान जी के पास गए और बोले कि आप तो बहुत ही शांतिप्रिय भक्ति में लीन रहने वाले महाबली हो आपको बाली से युद्ध करने की आवश्यकता नहीं, वैसे भी उसके पास स्वर्णहार है जिस से बाली सामने वाले की आधी  शक्ति छीन लेता है  |  हनुमान जी बोले मेरे बारे बाली कुछ कहता तो कोई बात नहीं थी पर उसने मेरे प्रभु के बारे में अपशब्द कहे हैं इस अवस्था में अगर मैंने उसको सबक सिखाया तो मेरे प्रभु और मेरा अपयश होगा | ब्रह्मा देव ने समझ लिया की अब बाली की खैर नहीं और उनके द्वारा अभिमंत्रित स्वर्णहार भी निष्फल ना होजाये | कुछ विचारकर ब्रह्मा जी ने  कहा कि आप अपनी शक्ति का दसवां भाग लेकर उसके सामने जाइएगा और तथा बाकी शक्ति अपने प्रभु को अर्पण  कर दीजिए|  बजरंगबली ने ऐसा ही किया अपनी शक्ति का दसवां भाग अपने प्रभु भगवान् राम को अर्पण करके बाली के सामने पहुंचे | युद्ध शुरू होते ही बाली ने उनकी दसवीं का आधा भाग याने की पांचवा भाग अपने शरीर में खींचना शुरू किया किन्तु बाली हनुमान जी की शक्ति का पांचवा भाग भी सहन कर सका | हनुमान जी की शक्ति का अंश बाली में प्रविष्ट होते ही उसके शरीर में कंपन होने लगा, नसें फटने सी लगी, सर घूमने लगा तब उसने ब्रह्मा जी को पुकारा कि प्रभु आप का वरदान विफल क्यों हो रहा है? यह मुझे अपनी पीड़ा क्यों हो रही है? आपका वरदान विफल कैसे हो सकता है तब ब्रह्माजी प्रकट हुए उन्होंने अभिमानी बाली को समझाया कि बाली तुम शक्तिशाली होते हुए भी हनुमान जी की शक्ति को धारण नहीं कर सकते उनकी शक्तियां अनंत है| तुम इस योग्य नहीं की हनुमान जी की शक्ति का तिनका भी सह सको वो तो तुम्हारे प्राणों की रक्षा हेतु ही सिर्फ दसवां भाग ही बजरंग बलि धारण किये हुए हैं | अब  तुरंत यहां से दूर चले जाओ वरना तुम्हारे प्राण संकट में सकते हैं ब्रह्मा जी की बात सुनते ही बाली तुरंत वहां से भाग गया | 

Once, like a mad elephant, roaming in the Chur Bali forests under his power, he saw Hanuman ji, who was engaged in chanting the name of Rama. The arrogant Bali said to Hanuman ji that you keep chanting, I am the most powerful one day I will call my lord Rama to see him too. Just after listening to this, Hanuman ji said that first show the Lord's devotee by defeating him. Shout. It was decided that if there would be war between the two, Brahma Ji went to Hanuman ji just before the war and said that you are a Mahabali, who is living in very peaceful devotion. Takes away half the power of the front. Hanuman ji said that there was nothing to say about Bali to me, but he has said abusive words about my lord, in this stage if I taught him a lesson, then my lord and I will be in love. Brahma Dev understood that now Bali is not well and the goldsmiths invited by him should not fail. After some thought, Brahma Ji said that you will take one tenth of your power and go before him And offer the rest of the power to your lord. Bajrangbali did this by offering one-tenth of his power to his lord Lord Rama and reached in front of Bali. As soon as the war started, Bali started to draw half of his tenth in his body, but Bali could not bear even a fifth of Hanuman's power. As part of the power of Hanuman ji, his body started vibrating as soon as he entered Bali, the veins started bursting, the head started to rotate, then he called Brahma Ji, why is Lord's blessing failing? Why is this my pain? How could your boon fail, then Brahmaji appeared and explained to the arrogant Bali that Bali, despite being powerful, you cannot hold the power of Hanuman ji, his powers are infinite. You are not able to bear the straw of Hanuman's power, he is wearing only one tenth part of Bajrang sacrifice to protect your life. Now immediately go away from here or else your life may come in trouble, Bali immediately ran away from there on hearing Brahma ji.
 
किष्किंधा काण्ड के अनुसार भगवान् राम ने बाली के द्वारा प्रताड़ित 
सुग्रीव से मित्रता की | प्रभु राम के आश्वासन देने पर वह अपने मित्र की सहायता हेतु बाली का वध करेंगे , सुग्रीव ने बाली को ललकारा | बालि किष्किंधा नगरी के बाहर आया दोनों में घमासान युद्ध हुआ क्योंकि दोनों भाइयों का मुख् तथा शरीर एक सा था  इसी असमंजस में श्री राम जी ने बाण नहीं चलाया | बाली से अपनी जान बचाकर सुग्रीव घायलावस्था में प्रभु  श्री राम जी के पास गया और बोला प्रभु आपने ऐसा क्यों किया ? श्री राम जी ने जैसे ही सुग्रीव के सर पर हाथ रखा सुग्रीव के सारे जख्म भर गए तथा उसका  शरीर फिर से वज्र के समान हो गया | राम जी ने उसको दोबारा से युद्ध के लिए  बोला तथा लक्ष्मण जी द्वारा सुग्रीव को पुष्पमाला पहना दी ताकि दोबारा कोई संदेह ना हो | जब बाली ने दोबारा युद्ध सुग्रीव की ललकार सुनी तो उसके क्रोध का ठिकाना ना रहा |  सुग्रीव को दोबारा ललकारते हुए जानकर बाली की पत्नी तारा को शंका हुई | तारा  को  इस बात का आभास  हो गया था कि सुग्रीव को राम का संरक्षण हासिल है क्योंकि अकेले तो सुग्रीव बाली को दोबारा लड़ने की हिम्मत कदापि नहीं करता | तारा ने बाली को सावधान किया और उसने कहा कि सुग्रीव को किष्किंधा का युवराज घोषित कर बाली उसके साथ संधि कर ले |  किंतु बाली ने सुग्रीव का पक्ष लेने पर तारा को दुत्कार दिया | दोनों भाइयों में द्वंद युद्ध शुरू हुआ लेकिन इस बार राम जी ने दोनों को पहचानने में कोई गलती नहीं करी और बाली पर पेड़ की ओट से बाण चला दिया | बाण ने बाली के हृदय को भेद दिया तथा बाली  धराशाई होकर जमीन पर गिर गया गया | भगवान राम ने बाली पर छुपकर बाण चलाया और बाली को यह बात अनुचित लगी तब बाली ने उनसे कारण पूछा | 

According to the Kishkindha scandal, Lord Ram tortured by Bali Befriended Sugriva. On assuring Lord Rama that he would kill Bali to help his friend, Sugriva challenged Bali. Bali came out of the city of Kishkindha, there was a fierce battle between the two brothers, because the face and body of the two brothers were the same, in the same confusion Shri Ram Ji did not shoot an arrow. After saving his life from Bali, Sugriva went to Lord Shree Rama Ji in an injured condition and said why did you do this? As soon as Shri Ram ji placed his hand on Sugriva's head, all the wounds of Sugriva were filled and his body again became like a thunderbolt. Ram ji again asked him for war and Laxman ji gave Sugriva a wreath so that there is no doubt again. When Bali again heard the war cry of Sugriva, there was no trace of his anger. Bali's wife Tara doubted knowing Sugriva again. Tara was aware that Sugriva enjoys the protection of Rama because Sugriva alone does not dare to fight Bali again. Tara cautioned Bali and he said that by declaring Sugriva as the crown prince of Kishkindha, Bali should make a treaty with him. But Bali rebuked Tara for favoring Sugriva. Duel war started between the two brothers, but this time Ram ji made no mistake in identifying both and fired an arrow with a tree on the earring. Baan pierced Bali's heart and Bali fell and fell to the ground. Lord Rama hid the arrow on Bali and Bali found this to be inappropriate, then Bali asked him the reason.

 
वानरराज बाली के प्रश्नों का प्रभु श्री राम जी धर्मानुसार उत्तर  दिया  ने तब प्रभु के प्रवचनों को सुनकर बाली का अभिमान टूटा और बाली को संतोष हुआ | बाली अपने अंतिम क्षणों में प्रभु की प्रभुता पहचान गया तथा प्रभु राम के चरणों में गिर पड़ा |बाली ने अपनी पत्नी तारा एवं पुत्र अंगद को भी भगवान राम का अनुसरण करने को कहा | 

Lord Rama answered the questions of Vanararaj Bali as per religion, then upon hearing the discourses of Lord, the pride of Bali was broken and Bali was satisfied. Bali recognized the sovereignty of the Lord in his last moments and fell at the feet of Lord Rama. Bali also asked his wife Tara and son Angad to follow Lord Rama.


 
 
बाली तथा श्री राम संवाद
 
 
बाली :- प्रभु आपने धर्म की रक्षा केलिए पृथ्वी पर अवतार लिया किन्तु मुझे इस तरह छिपकर क्यों मारा ? क्या यह धर्मविरुद्ध नहीं ?

Bali: Lord, you took incarnation on earth to protect religion, but why did I hide and hide me like this? Is this not unethical?
  
प्रभु श्री राम :- बाली अपनी मृत्यु शैया पर तुम वानर होकर धर्म-अधर्म की बात करते हो तो अचरज होता है|   जो भी तुम्हारी शक्ति है तुमने तपस्या या ज्ञान से अर्जित नहीं की अपितु अपने पिता इन्द्र से पाई है | वास्तविकता में धर्म क्या है तुम जैसा अभिमानी पशु क्या जाने जो अपने अनुज भाई सुग्रीव की पत्नी रूमा के साथ दुराचार कर चुका हो | तथा जहां तक छिपकर बाण चलाने का प्रश्न है पशु आखेट तो ऐसे ही किया जाता है और क्षत्रिय होने के कारण मैं ऐसा कर सकता हूँ | और सिर्फ तुम्हें मानने के लिए किष्किंदा के दूसरे वानरों की हत्या में नहीं करना चाहता था जो कि निर्दोष है| 
(यहाँ वास्तव में प्रभु नहीं जताना चाहते की वह कौन हैं उनका विचार था की यदि  इंद्र का वरदान मेरे सामने आने पर विफल हो जाता इसलिए मेरा सामने ना आना ही उचित है )

Prabhu Shri Ram: - When you talk about righteousness and unrighteousness on your deathbed, Bali is astonishing. Whatever your power is, you have not gained from austerity or knowledge, but from your father Indra. What is religion in reality, what can a proud animal like you, who has misbehaved with Ruma, the wife of his estranged brother Sugriva? And as far as the shooting of the arrow is concerned, the animal shooting is done in this way and I can do it because of being a Kshatriya. And just to believe you, I did not want to kill Kishkinda's other apes, which is innocent.
( Here Lord does not really want to show who he is. He thought that if Indra's boon fails when he comes in front of me, then it is only right that I do not come in front of him)

 
 
 बाली :- प्रभु मेरी तो आपसे कोई भी शत्रुता नहीं फिर आपने मुझे क्यों मारा ?

Bali: - Lord, there is no enmity with you, then why did you hit me?
 
  प्रभु श्री राम :- तुम्हारी  दुश्मनी मुझसे सीधी तरह से तो  नहीं लेकिन मेरे मित्र सुग्रीव से है इस प्रकार हे बाली मेरे मित्र का शत्रु भी मेरा शत्रु है | 

Prabhu Shri Ram: - Your enmity is not directly related to me, but my friend is from Sugriva, thus, O Bali, my friend's enemy is also my enemy.
 
 
बाली :- प्रभु मैं आपकी मदद कर सकता था सीता जी को ढूंढने के लिए आकाश पाताल एक कर देता | रावण क्या चीज है उसे तो मैं बगल में दबाकर पृथ्वी की परिक्रमा कर चुका हूं | मैं सुग्रीव से अधिक बलशाली हूँ तथा राजा हूँ |

Bali: - Lord, I could have helped you, to find Sita ji, Akash would have done one thing. I have revolved around the earth by pressing what is Ravan. I am stronger than Sugriva and I am the king. 
 
 
प्रभु श्री राम :- जो खुद किसी और की पत्नी का हरण और परायी स्त्रियों के साथ अनाचार करता हो उससे मैं अपनी पत्नी को पानी के लिए सहायता कैसे मांग सकता हूँ | रावण की भाँती तुम भी पथभ्रष्ट हो ऐसा मैं समझता हूं एक अधर्मी का साथ में कभी नहीं दे सकता ना ही उसका साथ ले सकता हूँ | सुग्रीव भले ही तुम्हारी तरह बलशाली नहीं किन्तु उसने कभी धर्म आचरण नहीं छोड़ा तो उससे तुम्हारी तुलना व्यर्थ है | 
 
Prabhu Shri Ram: - How can I ask my wife for help from someone who herself abducts someone else's wife and abuses them with foreign women. Like Ravan, you too are misguided, I understand that you can never support a wrongdoer or take him along. Even though Sugriva is not as powerful as you, but he has never given up his religious conduct, your comparison with him is meaningless.
 
 बाली :- प्रभु में तो वानर जाती से हूं मेरी खाल तथा मांस भी आप किसी काम का नहीं, तो मेरा वध क्यों करा ?

Bali: - I am a monkey from the forest, my skin and flesh are also of no use to you, so why kill me?
 
प्रभु श्री राम:- मैं क्षत्रिय हूँ तथा वन में पशुओं का आखेट करना मेरा अधिकार है और यह धर्म विरुद्ध भी नहीं क्योंकि तुम पशु ही हो |

Lord Shri Ram: - I am a Kshatriya and it is my right to hunt animals in the forest and it is not even against religion because you are an animal.
 
बाली :- प्रभु में आपकी प्रजा भी नहीं हूं फिर मुझे दंड देने का अधिकार आपको  नहीं है क्योंकि आप अयोध्या के राजा हैं किष्किंधा के नहीं  फिर आप मेरा वध कैसे कर सकते हैं ?

Bali: - I am not your subject even in God, then you do not have the right to punish me because you are the king of Ayodhya, not of Kishkindha, then how can you kill me?
 
प्रभु श्री राम:- इस भूलोक पर सूर्यवंश का ही राज्य है सूर्यवंश का राजा होने के नाते तथा रघुवंशियो की परम्परानुसार मेरा अधिकार है कि मैं जो भी यहां अधर्म करें मैं उसको दंड दूं हमारे राज्य की सीमा के बाहर  भी अगर कोई ऐसा अधर्म करता है तो भी अपने मित्र की रक्षा के लिए मैं उसका वध कर सकता हूँ | 

Prabhu Shri Ram: - On this land, only the kingdom of Suryavansh is being the king of Suryavansh and according to the tradition of Raghuvanshi, I have the right to punish whoever commits wrong here, even outside the limits of our state, if anyone commits such wrongdoing. Even then I can kill my friend to protect him.
 
 
विष्णु जी के अवतार राम जी ने वास्तव में बाली का वध करके उद्धार किया था | यहाँ तक की प्रभु ने अपने अगले अवतार में बाली को अवसर दिया की वह उनकी इसी प्रकार हत्या कर सके | द्वापर युग में भगवान् राम ने श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिया तथा बाली ने भील रूप में उनकी हत्या की इस प्रकार भगवान हमें बताते हैं की मृत्युलोक में अपने कर्मो का फल भोगना ही पड़ता है तथा कर्मफल से  मुक्ति का उपाए भगवान् के पास भी नहीं| कर्म चक्र सदा समय के चक्र समान चलता रहता है मनुष्य अपने वर्तमान जन्म में किये गए पाप को अपने अगले जन्म में या जन्मो में भुगतता ही है | यही विधि का विधान है इसलिए तो इस संसार में कर्मजाल से मुक्ति का कोई उपाय नहीं इसलिए भगवान् ने भगवद गीता में यही कहा है की कर्म किये जाओ और फल की चिंता में ना सोचो |  

Lord Rama, the incarnation of Vishnu, actually saved Bali by killing him. Even the Lord in his next incarnation gave an opportunity to Bali to kill him in this way. In the Dwapar Yuga, Lord Rama was born as Shri Krishna and Bali killed him in a Bhil form, thus God tells us that one has to bear the fruits of our deeds in the land of death and God does not even have the means to get rid of the results. The cycle of Karma goes on like the cycle of time, man always suffers the sin committed in his present life in his next life or in his births. This is the law of the law, so there is no way to get rid of the work in this world, therefore God has said in the Bhagavad-gītā that go do the deeds and do not think about the fruits.

 


 

 

गुरुवार, 4 जून 2020

जय महर्षि विश्वामित्र ( Jai Meharishi Vishwamitra)

|| जय श्री राम ||
 
 
|| जय महर्षि विश्वामित्र || 


ज्ञान और तपस्या के बल पर साधारण मनुष्य से महाऋषि बनने की कहानी है गुरु विष्वामित्र की | तपस्या जीवन के लिए बहुत ही आवश्यक है। .ब्रह्माजी तप करने पर ही सृष्टि की रचना कर सके थे। तपस्या के अंतर्गत चार प्रकार के संयम अपनाने पड़ते हैं—अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम और इंद्रिय संयम। विश्वामित्र जी ने १०००० वर्ष तक तपस्या की और राजऋषि कहलाये | 

Guru Vishwamitra's story of becoming a great sage from an ordinary man on the strength of knowledge and penance. Tapasya is very important for life. .Brahmaji was able to create the world only by meditating. Four types of sobriety are to be adopted under austerity - Earth sobriety, time sobriety, thought sobriety and sense sobriety. Vishwamitra did penance for 10000 years and was called Rajrishi.

 
युगों पूर्व एक शक्तिशाली एवम प्रिय क्षत्रिय राजा थे कौशिक | कौशिक एक महान राजा थे इनके संरक्षण में प्रजा खुशहाल थी | एक बार वे अपनी विशाल सेना के साथ जंगल की तरफ गये रास्ते में महर्षि वशिष्ठ का आश्रम पड़ा जहाँ रुककर उन्होंने महर्षि से भेंट की | गुरु वशिष्ठ ने राजा कौशिक का बहुत अच्छा आतिथी सत्कार किया और उनकी विशाल सेना को भर पेट भोजन भी कराया | यह देख राजा कौशिक को बहुत आश्चर्य हुआ कि कैसे एक ब्राह्मण इतनी विशाल सेना को इतने स्वादिष्ट व्यंजन खिला सकता हैं | उनकी जिज्ञासा शांत करने के लिये उन्होंने गुरु वशिष्ठ से प्रश्न किया – हे गुरुवर ! मैं यह जानने की उत्सुक हूँ कि कैसे आपने मेरी विशाल सेना के लिए इतने प्रकार के स्वादिष्ट भोजन का प्रबंध किया | तब गुरु वशिष्ठ ने बताया – हे राजन ! मेरे पास मेरी नंदिनी गाय हैं जो कि स्वर्ग की कामधेनु गया की बछड़ी हैं जिसे मुझे स्वयं इंद्र ने भेट की थी | मेरी नंदनी कई जीवो का पोषण कर सकती हैं | नंदनी के बारे में जानकर राजा कौशिक के मन में इच्छा उत्पन्न हुई और उन्होंने कहा – हे गुरुवर! मुझे आपकी नंदनी चाहिये बदले में आप जितना धन चाहे मुझसे ले ले | गुरु वशिष्ठ ने हाथ जोड़कर निवेदन किया – हे राजन ! नंदनी मुझे अत्यंत प्रिय हैं वो सदा से मेरे साथ रही हैं मुझसे बाते करती हैं मैं अपनी नंदनी का मोल नहीं लगा सकता वो मेरे लिए अनमोल प्राण प्रिय हैं | राजा कौशिक इसे अपना अनादर समझते हैं और क्रोध में आकर सेना को आदेश देते हैं कि वो बल के जरिये नंदनी को गुरु से छीन ले | आदेश पाते ही सैनिक नंदनी को हाँकने का प्रयास करते हैं लेकिन नंदनी एक साधारण गाय नहीं थी वो अपने पालक गुरु वशिष्ठ से आज्ञा लेकर अपनी योग माया की शक्ति से राजा की विशाल सेना को ध्वस्त कर देती हैं और राजा को बंदी बनाकर वशिष्ठ के सामने लाकर खड़ा कर देती हैं | वशिष्ठ अपनी सेना के नाश से क्रोधित हो गुरु वशिष्ठ पर आक्रमण करते हैं  गुरु वशिष्ठ क्रोधित हो जाते हैं और राजा के एक पुत्र को छोड़ सभी को शाप देकर भस्म कर देते हैं | अपने पुत्र के इस अंत से दुखी कौशिक अपना राज पाठ अपने एक पुत्र को सौंप तपस्या के लिये हिमालय चले जाते हैं और हिमालय में कठिन तपस्या से वे भगवान शिव को प्रसन्न करते हैं | भगवान शिव प्रकट होकर राजा को वरदान मांगने का कहते हैं | तब राजा कौशिक शिव जी से सभी दिव्यास्त्र का ज्ञान मांगते हैं | शिव जी उन्हें सभी शस्त्रों से सुशोभित करते हैं |

Kaushik was a powerful and beloved Kshatriya king ages ago. Kaushik was a great king and the people were happy under his patronage. Once, on the way to the forest with his huge army, he had the ashram of Maharishi Vasistha where he stopped and met Maharishi. Guru Vashistha gave very good hospitality to King Kaushik and also fed his huge army with food. Seeing this, King Kaushik was very surprised that how a Brahmin can feed such a delicious dish to such a huge army. To calm his curiosity, he questioned Guru Vashist - O Guruvar! I am curious to know how you have arranged such a delicious meal for my huge army. Then Guru Vashistha said - O Rajan! I have my Nandini cow which is the calf of Kamdhenu Gaya of heaven, which was given to me by Indra himself. My Nandni can nurture many lives. Knowing about Nandni, a desire arose in King Kaushik's mind and he said - O Guruvar! I want your Nandini to take as much money as you want from me. Guru Vashistha pleaded with folded hands - O Rajan! Nandani is very dear to me, she has always been with me, I talk to me, I cannot afford my Nandni, she is dear to me. King Kaushik considers this to be disrespect and in anger, orders the army to snatch Nandni from the Guru by force. On getting the order, the soldiers try to grab Nandani, but Nandani was not an ordinary cow, she takes orders from her foster guru Vasistha and demolishes the huge army of the king with the power of her yoga maya and brings the king captive in front of Vasishtha. Makes it stand. Vashistha gets angry at the destruction of his army and attacks Guru Vashistha, Guru Vashishta gets angry and curses everyone except one son of the king and consumes him. Unhappy with this end of his son, Kaushik goes to the Himalayas for penance handed over his secret lesson to one of his sons and he pleases Lord Shiva with hard penance in the Himalayas. Lord Shiva appears and asks the king to ask for a boon. Then King Kaushik asks Shiva to have knowledge of all the divyastras. Lord Shiva adorns them with all weapons.
 

धनुर्विद्या का पूर्ण ज्ञान होने के बाद राजा कौशिक पुनः अपने पुत्रों की मृत्यु का बदला लेने के लिये वशिष्ठ पर आक्रमण करते हैं और दोनों तरफ से घमासान युद्ध शुरू हो जाता हैं | राजा के छोड़े हर एक शस्त्र को वशिष्ठ निष्फल कर देते हैं | अंतः वे क्रोधित होकर कौशिक पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करते हैं जिससे चारो तरफ तीव्र ज्वाला उठने लगती हैं तब सभी देवता वशिष्ठ जी से अनुरोध करते हैं कि वे अपना ब्रह्मास्त्र वापस ग्रहण कर ले | वे कौशिक से जीत चुके हैं इसलिए वे पृथ्वी की इस ब्रह्मास्त्र से रक्षा करें | सभी के अनुरोध और रक्षा के लिए वशिष्ठ शांत हो जाते हैं ब्रह्मास्त्र वापस ले लेते हैं | वशिष्ठ से मिली हार के कारण कौशिक राजा के मन को बहुत गहरा आघात पहुँचता हैं वे समझ जाते हैं कि एक क्षत्रिय की बाहरी ताकत किसी ब्राह्मण की योग की ताकत के आगे कुछ नहीं इसलिये वे यह फैसला करते हैं कि वे अपनी तपस्या से ब्रह्मत्व हासिल करेंगे और वशिष्ठ से श्रेष्ठ बनेंगे और वे दक्षिण दिशा में जाकर अपनी तपस्या शुरू करते हैं जिसमे वे अन्न का त्याग कर फल फुल पर जीवन व्यापन करने लगते हैं | उनकी कठिन तपस्या से उन्हें राजश्री का पद मिलता हैं | अभी भी कौशिक दुखी थे क्यूंकि वे संतुष्ट नहीं थे |
 
एक राजा थे त्रिशंकु, उनकी इच्छा थी कि वे अपने शरीर के साथ स्वर्ग जाना जाते थे जो कि पृकृति के नियमों के अनुरूप नहीं था | इसके लिए त्रिशंकु वशिष्ठ के पास गये पर उन्होंने नियमो के विरुद्ध ना जाने का फैसला लिया और त्रिशंकु को खाली हाथ लौटना पड़ा | फिर त्रिशंकु वशिष्ठ के पुत्रों के पास गये और अपनी इच्छा बताई तब पुत्रों ने क्रोधित होकर उन्हे चांडाल हो जाने का शाप दिया क्यूंकि उन्होंने ने इसे अपने पिता का अपमान समझा | फिर भी त्रिशंकु नहीं माने और विश्वामित्र के पास गये | तब विश्वामित्र ने उन्हें उनकी इच्छा पूरी करने का वचन दिया जिस हेतु उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया और इसके लिये कई ब्राह्मणों को न्यौता भेजा जिनमे वशिष्ठ के पुत्र भी थे | वशिष्ठ के पुत्रों ने यज्ञ का तिरस्कार किया उन्होंने कहा – हम ऐसे यज्ञ का हिस्सा कतई नहीं बनेगे जिसमे चांडाल के लिए हो और किसी क्षत्रिय पुरोहित के द्वारा किया जा रहा हो | उनके ऐसे वचनों को सुन विश्वामित्र ने उन्हें शाप दे दिया और वशिष्ठ के पुत्रो की मृत्यु हो गई | यह सब देखकर अन्य सभी भयभीत हो गये और यज्ञ का हिस्सा बन गये | यज्ञ पूरा किया गया जिसके बाद देवताओं का आव्हाहन किया गया लेकिन देवता नहीं आये तब विश्वामित्र ने क्रोधित होकर अपने तप के बल पर त्रिशंकु को शारीर के साथ स्वर्ग लोक भेजा लेकिन इंद्र ने उसे यह कह कर वापस कर दिया कि वो शापित हैं इसलिये स्वर्ग में रहने योग्य नहीं हैं | त्रिशंकु का शरीर बीच में ही रह गया तब विश्वामित्र ने अपने वचन को पूरा करने के लिये त्रिशंकु के लिए नये स्वर्ग एवम सप्त ऋषि की रचना की | इस सब से देवताओं को उनकी सत्ता हिलती दिखाई दी तब उन्होंने विश्वामित्र से प्रार्थना की | तब विश्वामित्र ने कहा कि मैंने अपना वचन पूरा करने के लिए यह सब किया हैं अब से त्रिशंकु इसी नक्षत्र में रहेगा और देवताओं की सत्ता को कोई हानि नहीं होगी |
इस सबके बाद विश्वामित्र ने फिर से अपनी ब्रह्मर्षि बनने की इच्छा को पूरा करना चाहा और फिर से तपस्या में लग गए | कठिन से कठिन ताप किये | श्वास रोक कर तपस्या की | उनके शरीर का तेज सूर्य से भी ज्यादा प्रज्ज्वलित होने लगा और उनके क्रोध पर भी उन्हें विजय प्राप्त हुई तब जाकर ब्रह्माजी ने उन्हें ब्रह्मर्षि का पद दिया और तब विश्वामित्र ने उनसे ॐ का ज्ञान भी प्राप्त किया और गायत्री मन्त्र को जाना |उनके इस कठिन त़प के बाद वशिष्ठ ने भी उन्हें आलिंग किया और ब्राह्मण के रूप में स्वीकार किया | और तब जाकर इनमे कौशिक से महर्षि विश्वामित्र का नाम प्राप्त हुआ |
 
जब विश्वामित्र साधना में लीन थे | तब इंद्र को लगा कि वे आशीर्वाद में इंद्र लोक मांगेंगे इसलिये उन्होंने स्वर्ग की अप्सरा को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने भेजा चूँकि मेनका बहुत सुंदर थी विश्वामित्र जैसा योगी भी उसके सामने हार गया और उसके प्रेम में लीन हो गया | मेनका को भी विश्वामित्र से प्रेम हो गया | दोनों वर्षों तक संग रहे तब उनकी संतान शकुंतला ने जन्म लिया लेकिन जब विश्वामित्र को ज्ञात हुआ कि मेनका स्वर्ग की अप्सरा हैं और इंद्र द्वारा भेजी गई हैं तब विश्वामित्र ने मेनका को शाप दिया | इन दोनों की पुत्री पृथ्वी पर ही पली बड़ी और बाद में राजा दुष्यंत से उनका विवाह हुआ और दोनों की सन्तान भरत के नाम पर देश का नाम भारत पड़ा |
 
विश्वामित्र ने शस्त्रों का त्याग कर दिया था इसलिए वे स्वयं राक्षसी ताड़का से युद्ध नहीं कर सकते थे इसलिये उन्होंने अयोध्या से भगवान राम को जनकपुरी में लाकर ताड़का का वध करवाया |ताड़का रावण के मामा सूण्ड की पत्नी तथा सुबाहु तथा मारीच की माता थी |  मार्ग में उन्होंने राम तथा लक्ष्मण को "बाला-अतिचाला" नामक दो विद्या सिखायीं जिनसे भूख , प्यास, थकान , रोग तथा अचानक से शत्रु का वार आदि नहीं हो पाता | विश्वामित्र जी के मार्गदर्शन मैं भगवान् राम ने अहिल्या का उद्धार किया | इन्ही विश्वामित्र के कहने पर भगवान राम ने सीता के स्वयम्बर में हिस्सा लिया तथा शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर स्वयम्बर को जीता |